अटॉर्नी जनरल सुप्रीम कोर्ट में यौन हिंसा मामलों पर बोले ये बात

अटॉर्नी जनरल सुप्रीम कोर्ट में यौन हिंसा मामलों पर बोले ये बात

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सोमवार को शीष न्यायालय में कहा कि यौन हिंसा के मामलों में आरोपी को पीड़ित से राखी बंधवाने का आदेश सिर्फ ड्रामा है। अटॉर्नी जनरल ने न्यायाधीशों को लैंगिक रूप से संवेदनशील बनाने और जमानत की शर्तें निर्धारित करते समय तथ्यों पर केन्द्रित रहने की आवश्यकता पर जोर दिया। 

वेणुगोपाल ने जस्टिस एएम खानविलकर की पीठ से कहा कि न्यायाधीशों में लैंगिक संवेदनशीलता होनी चाहिए तो पीठ ने कहा, 'लैंगिक संवेदनशीलता हमारे आदेश का हिस्सा होगी। वेणुगोपाल यौन उत्पीड़न के एक मामले में आरोपी को कथित पीड़िता से राखी बांधने का आग्रह करने की शर्त पर जमानत दिए जाने के मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के 30 जुलाई के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई के दौरान दलीलें पेश कर रहे थे।'

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के 30 जुलाई के आदेश के खिलाफ नौ महिला अधिवक्ताओं ने यह अपील दायर कर इस पर रोक लगाने का अनुरोध किया है। इस अपील में कहा गया है कि देश भर की अदालतों को इस तरह की शर्तें लगाने से रोका जाना चाहिए, क्योंकि यह कानून के सिद्धांतों के विपरीत है। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में आरोपी को जमानत देते हुए यह शर्त लगाई थी 

कि वह अपनी पत्नी के साथ पीड़ित के घर जाएगा और उससे अपने हाथ पर राखी बंधवाने का अनुरोध करते हुए हमेशा उसकी सुरक्षा करने का वायदा करेगा। वीडियो कांफ्रेंस के माध्मय से इस मामले की सुनवाई के दौरान वेणुगोपाल ने उच्च न्यायालय के आदेश का जिक्र किया और कहा, जहां तक पेश मामले का संबंध है तो ऐसा लगता है कि वे भावावेश में आ गए। 

अटार्नी जनरल ने पीठ से कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी और राज्य अकादमियों को इस बारे में शिक्षा देनी चाहिए कि इसकी इजाजत नहीं है। न्यायाधीश भर्ती परीक्षा में भी लैंगिक संवेदनशीलता के बारे में एक हिस्सा होना चाहिए। यौन हिंसा के मामलों के आदेशों में आरोपी से यह कहना कि वह पीड़ित से राखी बंधवाए ड्रामा है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को पेश मामले के तथ्यों पर केन्द्रित रहने की आवश्यकता है। 

पहले से ही इस बारे में न्यायालय के फैसले हैं कि न्यायाधीशों को पेश मामले, विशेषकर जमानत की शर्तों के बारे में खुद को तथ्यों तक सीमित रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायिक अकादमी में शीर्ष अदालत के फैसले पढ़ाए जाने चाहिए और उन्हें निचली अदालतों तथा उच्च न्यायालयों के समक्ष रखा जाना चाहिए ताकि न्यायाधीशों को पता रहे कि क्या करने की आवश्कता है। पीठ ने अटार्नी जनरल से कहा कि क्या वह इस बारे में एक संक्षिप्त नोट दे सकते हैं।