सड़कों पर प्रतिस्पर्धा आस्था के हुड़दंग की

 
डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)
डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)

पूजा-पाठ देवी-देवताओं के प्रति आस्था का प्रगटीकरण है| परन्तु जब यह प्रगटीकरण सड़क छाप बन जाये और उसमें भी प्रतिस्पर्धा होने लगे तब फिर इसे आस्था का विकृतीकरण ही कहा जाना चाहिए| भारतीय संस्कृति के मूल वैदिक ग्रन्थों में पेड़-पौधों से लेकर नदी-तालाबों तक में देवत्व की परिकल्पना करके पर्यावरण संरक्षण का जो आस्थाजनित सन्देश दिया गया है, उसका अनुपालन हजारों वर्षों तक होता रहा और समाज प्रकृति के मूल स्वरुप को संरक्षित करने में सदैव सफल रहा| सृष्टि की उत्पत्ति, पोषण एवं संहार के कारणरूप में ईश्वर की प्रतिष्ठा और फिर उससे जुड़ने के लिए आस्था को आधार बनाया गया| इस हेतु एकान्त में ईश्वर के ध्यान, मनन या चिन्तन पर बल दिया गया| 


कदाचित यही योगाभ्यास और तपस्या की निष्पत्ति का आधार बना| योग का अर्थ ही जोड़ना है| स्वयं को प्रकृति या ईश्वर से जोड़ना योग है| ईश्वर को निर्विकारी तत्व माना गया है| शरीर की सजीवता का कारण आत्म तत्व को बताया जाता है| यह आत्म तत्व भी विकार रहित अर्थात निर्मल माना गया| आत्म तत्व को ईश्वर अर्थात परमात्मा से जोड़ने का माध्यम मन, चित्त या ध्यान को बताया गया| निर्मल परमात्मा से निर्मल आत्मा को जोड़ने का माध्यम मन, यदि निर्मल या विकाररहित नहीं है, तब फिर आत्मा को परमात्मा से जोड़ पाना भला कैसे सम्भव होगा| इसका अर्थ यह हुआ कि आस्था के मूल में मन का निर्मल अर्थात

विकाररहित होना परम आवश्यक है| लेकिन मन में यदि प्रतिस्पर्धा का भाव आ जाये, प्रदर्शन या दिखावे का मोह आ जाये, कर्तापन का अहंकार आ जाये, प्रशंसा पाने का लोभ जागृत हो जाये| 
तब फिर मन को निर्मल कैसे कहा जा सकता है? आस्था के प्रस्फुटन का एक नाम भक्ति भी है और इस हेतु किये जाने वाले विभिन्न अनुष्ठानों का आधुनिक नाम धार्मिक क्रिया-कलाप रखा गया| गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार परहित के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा देने से बड़ा कोई पाप नहीं है| तब फिर जिस अनुष्ठान से जन सामान्य को पीड़ा या परेशानी मिले, उसे धार्मिक क्रिया-कलाप की संज्ञा क्यों और कैसे दी जा सकती है| लेकिन दुर्भाग्य से आज हमारे चारो ओर हो यही सब रहा है| 


हाल ही में गणेश महोत्सव सम्पन्न हुए, उसके पूर्व श्रीकृष्ण-जन्म से सम्बन्धित कार्यक्रमों का दौर चला, उससे पूर्व सावन के महीने में शिवजी के नाम पर अनुष्ठान हुए| आगे नवरात्रि में दुर्गा पूजा के कार्यक्रम होंगे| वर्ष भर चलने वाले ऐसे अनेक आयोजन लगभग हर गली-मुहल्ले में होने लगे हैं| जगह-जगह रास्ता बन्द करके लगाये गये पाण्डालों में कर्णभेदी स्वरों में बजने वाले लाउडस्पीकरों से सामान्य जन-जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त दिखाई देने लगता है| रोगियों को समस्या, बच्चों को पढ़ाई में समस्या तथा फेरी लगाकर व्यापार करने वालों को समस्या| 
आयोजन समाप्ति के बाद मूर्ति-विसर्जन के नाम पर बड़े-बड़े जुलुस निकालने की भी परम्परा बन गयी है| जिसके कारण लगने वाले जाम से आम आदमी की रोजमर्रा की जिन्दगी प्रभावित होना स्वाभाविक है| कोई हॉस्पिटल जा रहा है, किसी को ट्रेन पकड़नी है तो कोई अति आवश्यक काम से निकला है| लेकिन घण्टों जाम में फंसकर सभी हलकान नजर आते हैं| धर्म तो समस्या का समाधान देता है| लेकिन यहाँ तो धार्मिक अनुष्ठान ही समस्या बन रहे हैं| इन अनुष्ठानों में भौड़े गीतों पर होने वाले नृत्य आदि के कार्यक्रम सांस्कृतिक ह्रास्व की भी पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं| विडम्बना यह भी है कि अनेक आयोजन स्थल तो ऐसे होते हैं जहाँ साल भर गन्दगी जमा रहती है|

ऐसे स्थानों पर देवी-देवताओं की मूर्ति की प्रतिष्ठा करके कितना पुण्य लाभ मिलता होगा, समझना मुश्किल है| क्योंकि अनुष्ठान समाप्त होते ही वहां पुनः कूड़े का अम्बार लग जाता है| जबकि शुद्धता पूजा की पहली शर्त है| मूर्ति विसर्जन से नदियों और सरोवरों का जल लगातार प्रदूषित हो रहा है, लाउडस्पीकरों का शोर ध्वनि प्रदूषण फैला रहा है| लेकिन कोई कुछ भी समझने के लिए तैयार नहीं है| धार्मिक आस्था जब उन्माद का रूप ले लेती है तब उस पर अंकुश लगा पाना असम्भव तो नहीं परन्तु मुश्किल अवश्य होता है| 
ऐसा सिर्फ हिन्दू समाज में ही नहीं है| इस्लाम सहित अन्य अनेक सम्प्रदायों के अनुयायी भी सड़को पर धार्मिक अनुष्ठान करने की होड़ में पीछे नहीं है| एक ओर वर्ग के अन्दर तो दूसरी ओर दो वर्गों के बीच होने वाली धार्मिक अनुष्ठानों की प्रतिस्पर्धा ने इस समस्या को और अधिक जटिल बना दिया है| यह प्रतिस्पर्धा कई बार साम्प्रदायिक संघर्ष का भी कारण बन जाती है| जिससे देश की एकता और अखण्डता का प्रभावित होना स्वाभाविक है| 
कई बार तो ऐसा लगता है जैसे देश में धार्मिक अनुष्ठानों की बाढ़ सी आ गयी है| लेकिन विद्रुप यह भी है कि लगभग हर सम्प्रदाय या धर्म के अनुयायी अपने ही धर्म की शिक्षाओं का अतिक्रमण करते हुए दिखाई देते हैं| एक तरफ कहा जाता है कि देवी-देवता भाव के भूखे होते हैं तथा तभी प्रसन्न होते हैं जब मन से उनकी प्रार्थना की जाती है और मन से की गयी उसी प्रार्थना या मन्त्र जप को उत्तम या सर्वाधिक फलदायी बताया गया है, जिसमें व्यक्ति के होंठ न हिलें या हिलें भी तो इतना धीमा स्वर निकले कि स्वयं के कान भी ना सुन पायें| लेकिन यहाँ तो लाउडस्पीकर से मन्त्रोच्चारण  और प्रार्थनाएं होती हैं| तब फिर कबीरदास जी कि वह पंक्ति स्वतः याद आती है कि ‘क्या बहरा हुआ खुदाय|’ 
प्रथम दृष्टया पूजा-पाठ प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय है| परन्तु यज्ञ-अनुष्ठान जैसे कार्यक्रम वातावरण की शुद्धता के कारक माने गये हैं| जिन्हें सार्वजनकि सहयोग से ही सम्पन्न किया जा सकता है| परन्तु दूसरे को परेशानी में डालकर मनमाने ढंग से ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करना, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है| बहु भाषी एवं बहु सम्प्रदाय वाले देश भारत के संविधान ने हर व्यक्ति को अपने सम्प्रदाय के अनुसार पूजा-पाठ करने तथा जीवन जीने का अधिकार दिया है| परन्तु इस अधिकार की आड़ में जन सामान्य के लिए परेशानियाँ खड़ी करना न तो संविधान सम्मत है और न ही कोई धर्म या सम्प्रदाय इसकी इजाजत देता है| अतः आवश्यक है कि धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन के लिए एक स्पष्ट नीति बने| परन्तु यह तभी सम्भव है जब सरकार तथा प्रत्येक वर्ग के विचारक मिलकर इस सन्दर्भ में कोई ठोस निर्णय लेंगे|