अन्नदाता किसान के पक्ष में हो फसलों का मूल्य निर्धारण

अन्नदाता किसान के पक्ष में हो फसलों का मूल्य निर्धारण

 रिपोर्टर योगेश कुमार शिवगढ़ रायबरेली

अर्थव्यवस्था के बुरे दौर में भी देश के अन्नदाता किसान ने अर्थव्यवस्था को जरा सा भी कमजोर नहीं दिया।जहां सारे सेक्टर धड़ाम से गिर गए लेकिन अन्नदाता किसान ने खून पसीने से फसल उगाकर बुरे दौर में भी देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का काम किया।महंगाई के इस दौर में अन्नदाता किसान की क्या हालत है सोचकर हीरूह कांप जाय।जो लोग खेती किसानी से दूर रहते हैं वह उनका दर्द तो समझ ही नहीं सकते।

गांव में जाकर देखिए कि इस समय पूरे देश में धान की लहलहाती हुई फसल खड़ी है। लेकिन बेचारे किसान अपनी फसल को जानवरों के आतंक से बचाने के लिए अपना घर परिवार छोड़कर अटान डालकर खेत में रह रहे है।किसान की खड़ी फसल जब बाढ़, ओला व अन्य प्राकृतिक आपदा से बर्बाद होती है तो किसी अन्नदाता की वेदना जाकर पूंछना तो बेचारा वह और उसका परिवार खून के आंसू रोता है

और बेबस होकर अपने नसीब को ही कोसता है उपरोक्त विचार सेवानिवृत्त शिक्षक, एवं पूर्व प्रधान शिवा शंकर शुक्ल के द्वारा ब्यक्त किये गये। उन्होंने कहा कि यदि देश को विश्व गुरु बनाना है और अर्थव्यवस्था में पूरे विश्व का सरताज बनना है तो कृषि क्षेत्र को मजबूत करना होगा और ऐसी नीति बनानी होगी कि अन्नदाता किसान अपनी फसल के रेट को खुद तय करे।आज देश की जनता जनार्दन से पूछना चाहता हूँ कि सुईं से लेकर हवाई जहाज तक बनाने वाली कंपनियां अपने सभी प्रोडक्ट के मूल्य को अपने हिसाब से निर्धारित करती हैं।

लेकिन अन्नदाता किसान जो पूरे देश का पेट भरता है उसकी फसल को एसी कमरे में बैठकर लोग किसानों की फसलों के मूल्य उसके लागत के सापेक्ष क्यों तय नहीं करते हैं यह बड़ी शर्मनाक स्थिति है।देश के युवाओं,किसानों और आम जनमानस को किसानों को अपनी फसल का मूल्य तय करने का अधिकार मिलना चाहिए इस हेतु पुरजोर आवाज बुलंद करके और यह हक़ लेने हेतु सभी को आगे आना होगा और अन्नदाता किसान को आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी बनाना होगा। तभी यह देश पूर्ण तरक्की कर सकता है व विश्वगुरु बन सकता है और देश की अर्थव्यवस्था और अधिक मजबूत हो सकती है।इससे देश में रोजगार के और अवसर पैदा होंगे।