लूट-घसोट को किसी और ने नहीं हम सब ने मिलकर बनाया है जानिया आखिर कैसे?

लूट-घसोट को किसी और ने नहीं हम सब ने मिलकर बनाया है जानिया आखिर कैसे?

लेखक शिवेंद्र सिंह बघेल।  शनिवार को नवरात्रि पर्व का आरंभ हुआ और से शुक्रवार को लोगों ने खूब सारी खरीददारी कि शायद आप भी खरीददारी करने गए होंगे और अगर उससे एक दिन पहले आपने खरीददारी की होगी तो आपको समझ में आ गया होगा कि सिर्फ कुछ घंटों में ही कितना अंतर आ गया सामान के दाम में। जिनसे सामान खरीदा गया, उन्हें कोई भी मुनाफा नहीं हुआ, जबकि बिचौलियों ने जमकर मुनाफा कमाया जैसे कि इस समय सब्जी के दामों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। भगवान से जुड़ी हुई चीजों में बढ़ोतरी हो रही है। छोटी-छोटी बातें करें तो फूल में भी बढ़ोतरी है। भगवान को जो चीजें चढ़ाते हैं, फल में भी बढ़ोतरी हो चुकी है। यानी कुल मिलाकर इस शब्द में समझ गए। इस नवरात्र के पर्व पर जो जितना लूट सकता है, लूट रहा है।

चलिए अगली तरफ बढ़ते हैं और कुछ एक दो बातें हैं और आप को समझाने की कोशिश करते हैं। आजकल नो स्कूल नो फीस को लेकर लगातार चर्चा चल रही है और लोग इसका समर्थन भी करते जा रहे हैं। लेकिन एक बात आपके सामने जो रख रहा हूं, उसको समझने की कोशिश करिएगा। जितने भी बड़े स्कूल है जिनका अपने आप में भोकाल टाइट है। वह आज भी बच्चों से उतने ही पैसे ले रहे हैं जितने वह कोरोना से पहले लेते थे मतलब साफ है कि वहां पर भी लूट मची है और जो मारा जा रहा है वह है ऐसा स्कूल जहां पर आप अपना वर्चस्व कायम कर ले जाते हैं।


चलिए अब एक और कदम आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं सरकार से आने वाली सुविधाओं की।  सरकार से आने वाली सुविधा आम आदमी तक नहीं पहुंच पाती है क्योंकि वहां पर लूट करने के लिए पहले से ही आपके प्रधान मौजूद हैं। आप के सभासद मौजूद हैं। आपका नगर निगम का अध्यक्ष मौजूद है। नगर पालिका का अध्यक्ष मौजूद है। उससे भी आगे बढ़ जाए तो वीडियो लिप्त हैं। बीडीसी लिप्त हैं, विधायक लिप्त हैं, सांसद लिप्त हैं। मंत्री जी लिप्त है और यहां तक कि सरकारें भी लिप्त हैं। आखिर किन को किन को छोड़िएगा और किन को किन को बचाएगा? क्योंकि सब तो लूट में लिप्त हैं।


चलिए एक और बात करते हैं। जब पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ते हैं तब फटाफट आपके ही अपने बस चालक टेंपो चालक ई रिक्शा चालक यह किसी भी वाहन की बात कर ले। वह सवारियों के दाम बढ़ा देते हैं लेकिन कम होने पर कभी आपसे यह नहीं कहते होंगे कि छोड़िए जाने दीजिए। अब पैसे कम हो गए हैं। अब कम ही दे दीजिए। दो कदम के 2 ₹ पहले लिखे थे लेकिन 2 कदम के दो की जगह 5 कब हो गए और पांच से कम होने का नंबर कब आएगा कुछ भी नहीं पता चल रहा है। लूट यहां भी व्याप्त है। बस समझने की जरूरत है।


चलिए अब आप हम अपनी और आपकी भी बात कर लेते हैं। हम उसी डॉक्टर के यहां जाना पसंद करते हैं जहां परनउसे प्राइवेट के नाम से पूजा जाता है। हां, हां, वही डॉक्टर जो सरकारी अस्पताल में ठीक से काम नहीं करते हैं, लेकिन हम उनसे सवाल नहीं पूछते हैं। हम उनसे जाकर सिर्फ इतना पूछते हैं कि डॉक्टर साहब शाम को क्लीनिक पर आप कितने बजे मिलेगा और एक रुपए का पर्चा कटवाने की जगह हम हजार रुपए फीस देना पसंद करते हैं क्योंकि डॉक्टर साहब हमें समय देते हैं। डॉक्टर साहब ने तो पहले भी सरकारी अस्पताल से पैसा लूट लिया। उसके बाद हम से भी लूट लिया और हम हंसी खुशी देकर इस वजह से चले आये क्योंकि डॉक्टर साहब ने 2 मिनट की जगह 5 मिनट हमसे बात कर ली और हां एक बात तो हम समझ ही नहीं पाए कि 2 मिनट की जगह 5 मिनट बात करने के चक्कर में डॉक्टर साहब ने सिर्फ एक हजार नहीं 10000 की दवा हमें लिख डाली। लूट यहां भी है बस समझने की जरूरत है।

और आखिरी कदम की तरफ बढ़ते हैं। हम किसी भी सरकारी संस्थान में जब अपना काम कराने जाते हैं तो वह फटाफट पैसों की डिमांड अपनी तरफ से खुद रख देते हैं कि साहब जितना हो सके, ले लीजिए, लेकिन काम कर दीजिए। मतलब साफ है कि आप अपने काम में काम चोरी खुद करवाने के लिए दूसरों को कह रहे हैं। दूसरा मतलब यह भी हो सकता है कि शायद आप के कागज नहीं पूरे होंगे या आप की चीजें नहीं पूरी होंगी। इस चक्कर में आप उससे कह रहे हैं कि आप मुझ से पैसा लीजिए और काम करिए। लूट यहां पर भी मौजूद है जो आपने की है और लूट वहां पर भी मौजूद है जो कम कागज में आपका काम करने जा रहा है।