अभावो में जी रहे लोगो की आशा की मीनार थे संत विनोवा भावे :आलोक गौड।

अभावो में जी रहे लोगो की आशा की मीनार थे संत विनोवा भावे :आलोक गौड।

फतेहपुर(नई सोच)।दिव्य कर्तव्य,मानवतावादी सोच, सबके उदय की कामना,चिन्मयी पुरुषार्थ और तेजोमय शौर्य से मानव-मानव की चेतना को झंकृत करने एवं धरती को जय जगत का सन्देश देने वाले युगपुरूष संत विनोबा भावे का जन्म 11 सितम्बर 1895 को हुआ था।कल उनकी जयंती है।इस महापुरूष ने भूदान,डाकूओं के आत्मसमर्पण तथा जय जगत के विचारों द्वारा वैश्विक समास्याओं के अहिंसक तरीके से समाधान निकालने के जीवन्त उदाहरण प्रस्तुत किये थे।

युवा विकास समिति के जिला प्रवक्ता आलोक गौड़ ने उन्हे अपना आदर्श संत बताया कहा वे हमारे लिये एक प्रकाश स्तंभ,राष्ट्रीयता,नैतिकता एवं अहिंसक जीवन एवं पीड़ितों एवं अभावों में जी रहे लोगों के लिये आशा एवं उम्मीद की एक मीनार थे,रोशनी उनके साथ चलती थी।वे संतों की उत्कृष्ट पराकाष्ठा थे,भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी,सामाजिक कार्यकर्ता,विशिष्ट उपदेष्टा,महान विचारक तथा प्रसिद्ध गांधीवादी नेता थे।उनका मूल नाम विनायक नरहरी भावे था।

वे भारत में भूदान तथा सर्वोदय आन्दोलन प्रणेता के रूप में सुपरिचित थे।वे भगवद्गीता से प्रेरित जनसरोकार वाले जननेता थे, प्रवचनकार थे,महामनीषी थे,जिनका हर संवाद सन्देश बन गया है।वे कर्मप्रधान व्यक्ति थे इसलिए गीता उनका आदर्श थी।उन्होंने अपने प्रवचनों में गीता का सार बेहद सरल शब्दों में जन-जन तक पहुँचाया ताकि उनका आध्यात्मिक उदय हो सके, अंधेरों में उजाले एवं सत्य की स्थापना हो सके।विनोबा भावे ने सर्वोदय समाज की स्थापना की।

यह रचनात्मक कार्यकर्ताओं का अखिल भारतीय संघ था। इसका उद्देश्य अहिंसात्मक तरीके से देश में सामाजिक परिवर्तन लाना था। इस कार्यक्रम में वे पदयात्री की तरह गाँव-गाँव घूमे और इन्होंने लोगों से भूमिखण्ड दान करने की याचना की, ताकि उसे कुछ भूमिहीनों को देकर उनका जीवन सुधारा जा सके। उनका यह आह्वान जितना प्रभावी रहा, वह विस्मित करता है। इस पवित्र कार्य में जमींदार लोग भी गरीबों को दिल खोलकर जमीन देने के लिए आगे आये।