कानपुर मे बंदूक के 90 लाइसेंस पर हुए डीएम के फर्जी साइन

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कानपुर कलेक्ट्रेट से फर्जी तरीके से जारी किए गए 90 हथियार लाइसेंस में भले ही अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है लेकिन हैरान करने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि सभी लाइसेंस पर डीएम विजय विश्वास पंत के जाली हस्ताक्षर हैं। ये सभी हस्ताक्षर कंप्यूटर से स्कैन किए गए थे। कंप्यूटर में कथित तौर पर इसकी पीडीएफ फाइल भी मिली है लेकिन जानकार इस तथ्य से आश्चर्यचकित हैं। उनका कहना है कि या तो पूरा सिस्टम बाईपास हुआ है या कोई गंभीर प्रशासनिक चूक है।

 एक जानकार के मुताबिक, कंप्यूटर और प्रिंटर की मदद से कागज पर प्रिंट किए गए गए साइन और पेन से किए गए साइन में दिन-रात का फर्क होता है। ऐसी कुछ फाइलें तो काम के दबाव में आगे बढ़ जाना संभव है लेकिन 90 फाइलें ऐसे ही साइन होकर आगे चली जाएं, यह समझ के बाहर की बात है। दूसरा तर्क यह है कि असलहों की फाइलों को अधिकारी बेहद गौर से चेक करते हैं। हर दस्तावेज बारीकी से जांचा जाता है। मामूली गड़बड़ी में भी फाइल रिजेक्ट होने में देर नहीं लगती। 


ऐसे में शस्त्र विभाग से लेकर जिले में मौजूद तमाम प्रशासनिक अधिकारियों ने क्या छपे हुए से हस्ताक्षर नहीं देखे, जो फाइलें आगे बढ़ गईं? इससे ज्यादा आश्चर्यजनक बात यह है कि इतने बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हुआ, जो सीधे तौर ऐसे में शस्त्र विभाग से लेकर जिले में मौजूद तमाम प्रशासनिक अधिकारियों ने क्या छपे हुए से हस्ताक्षर नहीं देखे, जो पर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है लेकिन इंटेलिजेंस एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। 

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शासन की सख्ती और मीडिया की नजरों के बीच कानपुर कलेक्ट्रेट में पसंदीदा लोगों को लाइसेंस देने में नए-नए तरीके अपनाए जा रहे थे। सूत्रों के अनुसार, जिस फाइल या आवेदन-पत्र पर लाल स्याही वाले पेन से साइन किए जाते थे, उन मामलों में लाइसेंस मिलना पूरी तरह तय होता था। इसी तरह नीली स्याही वाले पेन से हस्ताक्षर का साफ मतलब था कि इस आवेदक को लाइसेंस नहीं मिलेगा। 

प्रशासन अब तक इस बात का जवाब नहीं दे सका है कि जो 90 फर्जी लाइसेंस जारी हुए हैं, क्या ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करवाकर यूनीक आइडेंटिफिकेशन नंबर उनके लिए लिया गया या नहीं। दावों के उलट रविवार शाम तक विभाग के क्लर्क विनीत के बयान दर्ज करने कोई अधिकारी नहीं पहुंचा था। बताया जा रहा है कि उसे अस्पताल से डिस्चार्ज होने में कुछ समय लग सकता है। वहीं, काफी कोशिशों के बावजूद जांच अधिकारी सीडीओ अक्षय त्रिपाठी से बात नहीं हो सकी। 

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shishir Vishwakarma

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