मूर्ति खर्च पर मायावती को लग सकता है तगड़ा झटका…

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Vandana pandey

एक ओर राजनेता रैलियां कर जनता को लुभाने की कोशिश करने में लगे हुए हैं तो दूसरी ओर सप्रीम कोर्ट राजनेताओं से उनके बजट से ज्यादा किए गए खर्चों का हिसाब मांग रही है.

हम बात कर रहे हैं, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के सुनाए गए फैसले की. फैसला बसपा सुप्रीमो के मूर्ति प्रकरण का है. हालांकि, अभी निर्णय आना बाकी है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने मायावती से मूर्तियों में किए गए अनर्गल खर्च को सरकारी कोष में जमा करने का फैसला सुनाया है.

फिलहाल, यह कोई आज का मसला नहीं है, बीते 10 साल पुरानी यह कहानी है. जब मायावती ने बजट से ज्यादा खर्च काशीराम, भीमराव अंबेडकर, हाथी और खुद की मूर्तियां बनाने में किया था.

सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल उसी याचिका पर सुनावई हो रही थी, जिसमें बसपा सुप्रीमो को नोटिस जारी किया गया था. नोटिस था कि वह सरकारी पैसे को सार्वजनिक खर्च न करें. इस मामले में जिन्होंने याचिका दायर की थी, उस याचिकाकर्ता रविकांत का कहना था, “हम लोगों ने इस पूरे मामले में करदाताओं के चार हजार करोड़ रुपये के दुरुपयोग के सबूत कोर्ट के सामने रखे हैं. हालांकि जमीन की कीमत भी इसमें जोड़ दी जाए तो ये राशि और भी ज्यादा हो जाती है क्योंकि दोनों ही जगहों पर ये निर्माण कार्य बेहद प्राइम लोकेशंस पर हुए हैं.”

इस मामले की सुनवाई कर रहे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने स्पष्ट रूप से कहा है कि मूर्ति में जितने भी पैसे खर्च हुए हैं उन पैसों को मायावती को सरकारी कोष में जमा करना होगा. लेकिन मायावती की तरफ से पेश हुए वकील सतीश मिश्र ने कोर्ट से मई के बाद सुनवाई करने की अपील की. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस अर्जी को खारिज कर दिया है.  

चुनाव सिर पर हैं, और सर्वोच्च न्यायालय ने जिस तरह से मायावती को झटका दिया है, उससे तो यही लगता है कि बसपा सुप्रीमो चुनाव में ध्यान देंगी या कोर्ट के फैसले पर. कहीं, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला माया की चुनावी काया न पलट दे.

अब कितना पैसा पार्टी बसपा सुप्रीमो ने मुर्तियां बनाने में खर्च किया है, इसका भी आंकड़ा आपको देते है-   

उत्तर प्रदेश में 2007 से 2012 के बीच शासन करने वाली मायावती ने अपने शासनकाल में लखनऊ और नोएडा को मूर्तियों से सुसज्जित कर दिया था. सत्ता हाथ में थी, कोई रोकने-टोकने वाला भी नहीं था…मन मुताबिक खूब अनाब-सनाब पैसा खर्च किया गया. हालांकि, इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जब सूबे में माया की सरकार थी, लोग उनकी सत्ता का लोहा मानते थे. ऐसा मायावती ही एक ऐसी महिला थी जिन्होंने कुछ नियम बनाए और उन नियमों को काफी सख्ती से पालन किया और करवाया.

अब आते हैं मूल बात पर, दरअसल, 2007 से 2012 में बसपा सुप्रीमो ने अपने राज में लखनऊ और नोएडा में दो बड़े पार्क बनवाए और इन पार्कों में बसपा सुप्रीमो ने बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर, बीएसपी के संस्थापक कांशीराम और जो पार्टी का चुनाव चिह्न हाथी है उसकी और खुद की भी कई मूर्तियां बनवाई थीं. आपको यह भी बता दें कि इन मूर्तियों में इस्तेमाल की गई धातु पत्थर और कांसे की है. जिस समय ये मूर्तियां बनाई गईं, उस वक्त इन परियोजनाओं की लागत 1,400 करोड़ रुपए से ज्यादा थी, जिसमें मूर्तियों पर 685 करोड़ रुपए खर्च हुए. मामला ईडी तक पहुंचा, तब प्रवर्तन निदेशालय ने 111 करोड़ रुपए का सरकारी नुकसान होने का मामला दर्ज किया था.

हालांकि, ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी प्रमुख को आगाह न किया हो. साल 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने यूपी सरकार से पार्क और मूर्ति में किए गए खर्चों का ब्यौरा मांगा था. जानकारी के लिए बता दें कि इस मुद्दे को हाई लाइट करने का काम अखिलेश यादव ने किया था. जो आज मायावती के सबसे ज्यादा हितैषियों में गिने जा रहे हैं. तब उन्होंने माया की यह कहकर आलोचना की थी कि वह सरकारी पैसे का दुरुपयोग कर रही है.

आज गठबंधन की सरकार बनाने जा रहे अखिलेश यादव ने 2012 में विधानसभा चुनाव के दौरान कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी बसपा सुप्रीमो को घेरने में. उन्होंने बाकायदे इसको मुद्दा बनाया और 40 हजार करोड़ के मूर्ति घोटाले का आरोप उन पर लगाया था. फिर इसके बाद उन्होंने अपनी सरकार बनाई. हालांकि, मीडिया ने जब अखिलेश यादव से सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल किया तो उन्होंने जवाब देना मुनासिफ न समझा.

आपको बता दें कि अखिलेश यादव की सरकार में ही लखनऊ विकास प्राधिरकरण की एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें दावा किया गया था कि लखनऊ, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बनाए गए पार्कों पर कुल 5,919 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे. इन्हीं पार्कों में ये मूर्तियां लगाई गई हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, नोएडा स्थित दलित प्रेरणा स्थल पर बीएसपी के चुनाव चिन्ह हाथी की पत्थर की 30 मूर्तियां जबकि कांसे की 22 मूर्तियां लगाई गई थीं. जिसमें 685 करोड़ का खर्च आया था. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इन पार्कों और मूर्तियों के रखरखाव के लिए 5,634 कर्मचारी बहाल किए गए थे.

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले रविकांत ने कहा, “इस मामले में बचाव पक्ष का कहना था कि जो भी धनराशि खर्च हुई उसे राज्य की विधानसभा ने अपनी स्वीकृति दी थी इसलिए कानूनी तौर पर इसमें कोई गलती नहीं है लेकिन हमारी दलील थी कि चार हजार करोड़ रुपये यदि कोई पार्टी अपने चुनाव निशान और खुद की पब्लिसिटी पर खर्च कर दे तो वो करदाताओं के खून-पसीने की कमाई का दुरुपयोग है और राज्य को ऐसा करने का अधिकार नहीं है.”

हालांकि, मायावती के राजनीतिक करियर से कोई भी अंजान नहीं है. लेकिन मूर्ति विवाद पर लोकायुक्त ने अपनी रिपोर्ट में भी उन पर कई सवाल उठाए हैं. वहीं, चुनाव आयोग भी मूर्तियों पर आपत्ति जता चुका है.

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बहुजन समाज पार्टी को आर्थिक संकट से गुजरना पड़ सकता है लेकिन चुनाव में क्या असर होगा इसके बारे में जानकार बताते हैं कि यह कोई पहली मर्तबा नहीं है जब मूर्ति विवाद को उछाला गया हो, पहले भी ऐसा हो चुका है. इससे बसपा को आर्थिक संकट तो हो सकता है, लेकिन राजनीति में कोई असर होता नजर नहीं आ रहा है. एक वरिष्ठ पत्रकार की माने तो, “मायावती के इस काम की तब भी बहुत आलोचना हुई थी लेकिन उन्होंने ये सब दलित समाज के महापुरुषों के सम्मान के नाम पर यानी दलित अस्मिता के नाम पर ऐसा करने की बात की थी. जाहिर है, इससे उनके मतदाता खुश ही हुए थे और वो आज भी हैं. हां, बौद्धिक वर्ग में आलोचना जरूर हुई लेकिन मायावती ने 2017 में विधान सभा चुनाव से पहले ही ये स्पष्ट कर दिया था कि आगे से वो इस तरह के काम नहीं करेंगी.”

वहीं, एक राजनीति के विश्लेषक ने बीजेपी को घेरते हुए कहा कि “समाजवादी पार्टी तो अब उनके साथ ही है, कांग्रेस भी फिलहाल मायावती की आलोचना से बचेगी और भारतीय जनता पार्टी तो मूर्तियों के नाम पर सवाल उठाने का हक ही नहीं रखती क्योंकि अब तो वो खुद महापुरुषों की मूर्तियों के निर्माण पर न सिर्फ अरबों रुपये खर्च कर रही है बल्कि इसके लिए बाकायदा बजट में प्रावधान हो रहा है.”

बहरहाल,  सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मायावती को झटका तो लगेगा ही, लेकिन बात अगर मूर्ति खर्चे की करें तो वर्तमान सरकार ने भी मूर्तियों पर अथाह खर्चा किया है. अब वो बात अलग है कि एक ने जातिवाद पर की और एक ने मूर्तियों से राजनीतिक वार किया है. सरकार कोई भी हो सवाल वही है कि आखिर मूर्तियों पर फिजूल खर्ची क्यों की जाती है. क्या जनता आपका फिजूल खर्च वहन करने के लिए बैठी है.

अब खर्चे सिर्फ मूर्तियों से ही नहीं बल्कि कितनी तरीके से राजनेता जनता का पैसा पानी की तरह बहाते हैं, वह भी जान लीजिए…विकास के नारे लगाने वाले नेता, कभी चुनाव प्रचार के माध्यमों पर खर्च करके, कभी रोड शो करके और भी न जानें कितने तरीकों से पब्लिक का पैसा बर्बाद किया जाता है, वह भी उनकी अपनी हां, हूजूरी करवाकर.

यही कुछ देखने को मिला आज लखनऊ में भी. जहां प्रियंका गांधी वाड्रा ने रोड शो किया. अब ऐसा तो कह नहीं सकते कि उन्होंने इस रैली में कोई खर्च न किया हो…जाहिर है, जब उनके छोटे-छोटे इवेंट में करोड़ो का खर्च आता है, फिर तो ये रोड शो है….कल्पना कर सकते हैं आप…फिलहाल, पैसा आपका है आप निर्णय लीजिए.

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